वायरिंग किसे कहते है ? वायरिंग के प्रकार

वायरिंग किसे कहते है – जब किसी सर्किट में वायर, स्विच, होल्डर इत्यादि भारतीय विद्युत नियम के अनुसार लगाए जाए तो उसे वायरिंग कहते हैं |

किसी भी स्थान पर वायरिंग करने के पहले निम्नलिखित पॉइंट को ध्यान रखना चाहिए

  1. सुरक्षा = वायरिंग एक अच्छे और कुशल इलेक्ट्रिशियन से करानी चाहिए और लीकेज अथवा शाॅक का कोई खतरा नहीं होना चाहिए!
  2. मूल्य = चुनी हुई वायरिंग सस्ती, कम खर्च वाली होनी चाहिए जिसमें वायरिंग करवाने वाले पर कम खर्चा आए।
  3. सुविधा = वायरिंग सिस्टम में वायरिंग को बढ़ाने या दोबारा बदलने की सुविधा जरूर होनी चाहिए जिससे आसानी से बढ़ाई व बदली जा सके!
  4. दिखावा = वायरिंग किसी अच्छे आर्किटेक्ट के डिजाइन द्वारा करवानी चाहिए जो कि देखने में अच्छी लगती है।
  5. मैकेनिकल सुरक्षा = वायरिंग को भौतिक स्वभाव के नुकसान से बचाना चाहिए जबकि वह मकान तथा फैक्ट्री में काम आ रही है

वायरिंग कितने प्रकार की होती ही

वायरिंग मुख्य रूप से दो प्रकार की होती है

1. अस्थायी वायरिंग

2. स्थायी वायरिंग ‌‌।

अस्थायी वायरिंग

वह वायरिंग जिसका उपयोग कुछ ही समय के लिए किया जाना हो उसे अस्थायी वायरिंग कहते है | जैसे किसी शादी , पार्टी या अन्य समारोह में की गयी वायरिंग अल्प समय के लिए होती है | तो इसे अस्थायी वायरिंग के नाम से जाना जाता है | यह अस्थायी वायरिंग दो प्रकार की होती है-

1. फ्लैक्सिबल वायरिंग,

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2. क्लीट वायरिंग।

1. फ्लैक्सिबल वायरिंग = फ्लेक्सिबल तार आसानी से इधर उधर मुडने वाले तार है | यह कई लाल सफेद, पीली लाल, लाल काली, रंगों में बाजार में उपलब्ध है | इनमें एक साथ कई पतली तारे होती है इनमें तांबे की तारों का प्रयोग किया जाता है | शादियों में या कही अस्थाई कार्यों के लिए पेंडेंट होल्डर लटकाना हो वहां , कुछ समय के लिए लैंप प्रयोग करना हो , लाइट डेकोरेशन कहीं टेंट लगे हो वहां,आदि स्थानों पर पूर्ण रूप से फ्लैक्सिबल तारों की वायरिंग की जाती है इसमें लाभ यह है कि यह कम समय में की जा सकती है व अधिक महंगी नहीं होती है।

2.क्लीट वायरिंग = क्लीट वायरिंग पूर्ण रूप से अस्थाई वायरिंग है इनको गिटिटयो पर सीधा कसा जाता है क्लीट के 2 भाग होते हैं बेस व कवर। बेस भाग मैं से PVC तारों को गुजारा जाता है | वर्तमान में इस वायरिंग का प्रयोग कम होता है वायरिंग जहां करनी हो वहां दीवार पर पहले नील से मार्किंग करते हैं फिर 40 – 50 सेंटीमीटर की दूरी पर लकड़ी की बनी गिट्टीओ के लिए छैनी से छेद करके सीमेंट बजरी की सहायता से गिट्टीओ को फिट करते हैं गिट्टीओ के सूखने के बाद जितनी तारे परिपथ के लिए गुजारनी है उतनी ही रास्ते की क्लीटस को पेंच की सहायता से कसा जाता है | वायरिंग पूरी खुली दिखाई देती है क्लीटस की दूरी 15 से 20 सेंटीमीटर तक रखनी चाहिए | क्लीट वायरिंग की मरम्मत शीघ्रता से की जा सकती है पर यह देखने में सुंदर नहीं लगती है तारों का इंसुलेशन उतरने का डर रहता है।

स्थायी वायरिंग

लम्बे समय के लिए उपयोग की जाने वाली वायरिंग स्थायी वायरिंग कहलाती है | स्थाई वायरिंग मुख्य रूप से निम्न प्रकार की होती है।

  • केसिंग कैपिंग वायरिंग
  • वुडन केसिंग कैपिंग (पी.वी.सी) ,
  • बैटन वायरिंग,
  • लैड शीथड वायरिंग,
  • कन्ड्यूट वायरिंग (धातु),
  • कन्सील्ड वायरिंग,
  • कन्ड्यूट वायरिंग( पी .वी .सी)

1. वुडन केसिंग कैपिंग वायरिंग = यह वायरिंग सागवान की बनी होती है इसमें केसिंग कैपिंग 2 भाग होते हैं केसिंग में नालियां बनी रहती है इसमें दो व तीन नालियां इनकी साइज 12.5 एमएम इनटू 35 एमएम, 20 एमएम इनटू 50 एमएम होती है कैपिंग लाइन ऊपर बनी रहती है जिसमें यह पता चल सके की नीचे तार गुजर रही है यह वायरिंग 30 वर्षों तक लगातार पूरे देश में की जाती रही है इस वायरिंग को करते समय पीवीसी या वी आई आर की तारे उपयोग में लाई जाती है।

2. पीवीसी केसिंग कैपिंग वायरिंग – वुडेन केसिंग कैपिंग का स्थान पी.वी.सी की केसिंग कैपिंग वायरिंग ने ले लिया है | पीवीसी के केसिंग कैपिंग कई रंगों में आती है | इसके जॉइंट भी पीवीसी के बने हुए होते हैं | पीवीसी की बनी स्लीव को गिट्टीयो स्थान पर प्रयोग में लाते हैं गिट्टीयो की दूरी 60 सेंटीमीटर रखते हैं |

3. बैटन वायरिंग = इस प्रकार की वायरिंग लकड़ी की बनी बेटन 2 मीटर लंबाई में 12.5mm x 20mmआदि साइज में उपलब्ध होती है | इस वायरिंग के लिए बेटन का चयन तारों की संख्या पर निर्भर करता है | तारों को एक व्यवस्थित रूप से रखने के लिए लिंक क्लिप का प्रयोग किया जाता है | इन्हें किलो की सहायता से बेटन पर फिक्स किया जाता है व क्लिपो को 60mm, 75mm की दूरी पर लगाया जाता है |पहले जहां-जहां से तारों को गुजारना है वहां सही मार्किग करके गिट्टीयो दीवार पर लगाया जाता है उसके बाद उचित साइज की लिंक क्लिपो को 20mm साइज की पतली किलो से बेटन पर हैमर द्वारा ठोक कर लगाया जाता है | विद्युत सहायक सामग्री स्विच होल्डर सीलिंग रोज सॉकेट आदि को कसा जाता है।

4.लैड शीथड वायरिंग =इस प्रकार की वायरिंग खुले स्थानों पर नमी तथा धूप वाले स्थानों पर की जा सकती है | इस प्रकार की वायरिंग मैं तारों या केबलों पर सीसे का आवरण चढ़ा होता है ये यांत्रिक रूप से सुदृढ़ होती है इसमें सीसे तथा एलुमिनियम का मिश्रित कवर भी चढ़ाया जाता है| इस वायरिंग में लगाए जाने वाले जॉइंट जंक्शन बॉक्स में लगाए जाते हैं व‌ उनमें कंपाउंड भर के उन्हें सील किया जाता है।

5..कन्ड्यूट वायरिंग = सामान्य रूप से कन्ड्यूट को एक नलिका या चैनल के रूप में परिभाषित किया जाता है | विद्युत वायरिंग में सामान्य रूप से उपयोग में आने वाली नलिका कन्ड्यूट होती है।

6. कंसील्ड या दीवार के अंदर छिपी हुई वायरिंग या डक्ट वायरिंग = यह वायरिंग बहुत प्रचलित है इसमें दीवार की सुंदरता बनी रहती है | यह कहीं पर दिखाई नहीं देती है केवल बोर्ड होल्डर दिखाई देते हैं | भवन बनाते समय ही कारीगर कन्ड्यूट के लिए खांचे बना देते हैं | लेआउट प्लाई जो वायरिंग का होता है उसके अनुसार लोहे की अथवा पीवीसी की कन्ड्यूट दीवार के अंदर हुको से फीट करके वायरिंग तारों को इनमें डाला जाता है इसमें आवश्यक सामग्री एल्बो सॉकेट बैंड टी जंक्शन बॉक्स लगाए जाते हैं।

7. पी.वी.सी कन्ड्यूट वायरिंग = पीवीसी पाइप गुणवत्ता वाला होना चाहिए | पीवीसी कन्ड्यूट मैं सॉकेट ,एल्बो ,बैंड ,टी, जंक्शन बॉक्स ,राउंड ब्लॉक, बोर्ड, शैडल एवं अन्य सभी सामग्री पीवीसी की होनी चाहिए | छत में पीवीसी कन्ड्यूट डालते समय यह ध्यान रहे की आर.सी.सी डालते समय पर वजन नहीं आए अतः आसपास रेत भर दे |

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